Friday, 15 July 2016

लक्ष्मी की प्रसन्नता का छोटा-सा उपाय

पढ़िए एक छोटा सा उपाय और कलह क्लेश दूर
हिन्दू धर्म परंपराओं व मान्यताओं में सायंकाल यानी ढलती शाम प्रदोष काल, गोधूली बेला आदि के रूप में देव पूजा, उपासना या आवाहन के जरिए कामनासिद्धि, कलह और परेशानियों से छुटकारे के लिए बहुत ही श्रेष्ठ व शुभ माना जाता है।
शास्त्रों के मुताबिक ऐसे ही पुण्यकाल में धन और ऐश्वर्य की देवी विष्णु पत्नी लक्ष्मी भ्रमण पर निकलती है। इसलिए घर-परिवार से कलह, दरिद्रता, रोग या आर्थिक तंगहाली को दूर करने के लिए ऐसे वक्त घर में दीप लगाना बहुत ही शुभ बताया गया है। पवित्रता और प्रकाश खुशहाली का ही प्रतीक होता है। मान्यता है कि ऐसे स्थान और दीप ज्योति से माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर वहीं वास करने लगती है।
खास तौर पर विष्णु भक्ति का विशेष काल माने गए आषाढ़ माह में भी विष्णुप्रिया लक्ष्मी का स्मरण घर-परिवार में समृद्धि के साथ शांति भी लाने वाला माना गया है। आप भी ऐसी कामना रखते हैं, तो जानिए हर शाम लक्ष्मी की प्रसन्नता का यह छोटा-सा उपाय-
रोजाना सायंकाल के वक्त घर के देवालय या पवित्र स्थान पर अक्षत यानी पूरे चावल पर रख माता लक्ष्मी या देव स्मरण कर यह मंत्र बोलते हुए 2 दीपक प्रज्जवलित करें। इनमें से दीप घर के प्रवेश द्वार पर रख देवी लक्ष्मी का ध्यान करते हुए निरोगी व समृद्ध जीवन की कामना करें-

दीपो ज्योति: परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:।
दीपो हरतु मे पापं सांध्यदीप नमोस्तुते।।
शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदम्।
शत्रुबुद्धिविनाशाय च दीपज्योतिर्नमोस्तु ते।।

आनंद पर शर्त

एक दिन एक उदास पति-पत्नी संत फरीद के पास पहुंचे। उन्होंने विनय के स्वर में कहा,’बाबा, दुनिया के कोने-कोने से लोग आपके पास आते हैं, वे आपसे खुशियां लेकर लौटते हैं। आप किसी को भी निराश नहीं करते। मेरे जीवन में भी बहुत दुख हैं । मुझे उनसे मुक्त कीजिए ।’ फरीद ने देखा, सोचा और झटके से झोपड़े के सामने वाले खंभे के पास जा पहुंचे । फिर खंभे को दोनों हाथों से पकड़कर ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगे । शोर सुनकर सारा गांव इकट्ठा हो गया । लोगों ने पूछा कि क्या हुआ तो बाबा ने कहा-‘इस खंभे ने मुझे पकड़ लिया है, छोड़ नहीं रहा है।’ लोग हैरानी से देखने लगे ।
एक बुजुर्ग ने हिम्मत कर कहा-‘बाबा, सारी दुनिया आपसे समझ लेने आती है और आप हैं कि खुद ऐसी नासमझी कर रहे हैं । खंभे ने कहां, आपने खंभे को पकड़ रखा है ।’ फरीद खंभे को छोड़ते हुए बोले, ‘यही बात तो तुम सब को समझाना चाहता हूं कि दुख ने तुम्हें नहीं, तुमने ही दुखों को पकड़ रखा है । तुम छोड़ दो तो ये अपने आप छूट जाएंगे ।’
उनकी इस बात पर गंभीरता से सोचें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि हमारे दुख-तकलीफ इसलिए हैं क्योंकि हमने वैसी सोच बना रखी है । ऐसा न हुआ तो क्या होगा और वैसा न हुआ तो क्या हो सकता है । सब दुख हमारी नासमझी और गलत सोच के कारण मौजूद हैं । इसलिए सिर्फ अपनी सोच बदल दीजिए, सारे दुख उसी वक्त खत्म हो जाएंगे। ऐसा नहीं है कि जितने संबुद्ध हुए हैं, उनके जीवन में सब कुछ अच्छा-अच्छा हुआ हो, लेकिन वे 24 घंटे मस्ती में रहते थे । कबीर आज कपड़ा बुन कर बेचते, तब कल उनके खाने का जुगाड़ होता था । लेकिन वह कहते थे कि आनंद झरता रहता है नानक आनंदित होकर एकतारे की तान पर गीत गाते चलते थे । एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सुख और दुख सिर्फ आदतें हैं । दुखी रहने की आदत तो हमने डाल रखी है । सुखी रहने की आदत भी डाल सकते हैं
एक प्रयोग कीजिए और तुरंत उसका परिणाम भी देख लीजिए। सुबह सोकर उठते ही खुद को आनंद के भाव से भर लीजिए । इसे स्वभाव बनाइए और आदत में शामिल कर लीजिए । यह गलत सोच है कि इतना धन, पद या प्रतिष्ठा मिल जाए तो आनंदित हो जाएंगे । दरअसल, यह एक शर्त है । जिसने भी अपने आनंद पर शर्त लगाई वह आज तक आनंदित नहीं हो सका । अगर आपने बेशर्त आनंदित जीवन जीने का अभ्यास शुरू कर दिया तो ब्रहमांड की सारी शक्तियां आपकी ओर आकर्षित होने लगेंगी ।
क्राइस्ट ने अद्भुत कहा है, ‘पहले तुम प्रभु के राज्य में प्रवेश करो यानी तुम पहले आनंदित हो जाओ, बाकी सभी चीजें तुम्हें अपने आप मिलती चली जाएंगी ।

बोल मीठे न हों तो

बोल मीठे न हों तो हिचकियाँ भी नहीं आतीं
कीमती मोबाइलों पर घंटियाँ भी नहीं आती
घर बड़ा हो या छोटा, गर मिठास न हो तो
इनसान तो क्या चीटियाँ भी नहीं आतीं

मीठे बोल बोलिए
क्योंकि
अल्फाजों में जान होती है
इन्हीं से आरती, अरदास और अजान होती है
ये दिल के समंदर के वो मोती हैं
जिनसे इंसान की पहचान होती है

बोलने से ही हम जाने जाते हैं और बोलने से ही हम विख्यात या कुख्‍यात भी हो सकते हैं। उतना ही बोलना चाहिए जितने से जीवन चल सकता है। व्यर्थ बोलते रहने का कोई मतलब नहीं। भाषण या उपदेश देने से श्रेष्ठ है कि हम बोधपूर्ण जीवन जीकर उचित कार्य करें।
मनुष्य को वाक क्षमता मिली है तो वह उसका दुरुपयोग भी करता है, जैसे कि कड़वे वचन कहना, श्राप देना, झूठ बोलना या ऐसी बातें कहना जिससे कि भ्रमपूर्ण स्थिति का निर्माण होकर देश, समाज, परिवार, संस्थान और धर्म की प्रतिष्ठा गिरती हो।
चूडियों का व्यापारी, एक गधी पर चूडियां लाद कर बेचा करता था। एक बार किसी एक गांव से दूसरे गांव जाते हुए रास्ते में बोलता जा रहा था, ‘चल मेरी माँ, तेज चल’।’चल मेरी बहन,जरा तेज चल’। साथ चल रहे राहगीर नें जब यह सुना तो पूछे बिना न रह पाया। “मित्र तुम इस गधी को क्यों माँ बहन कहकर सम्बोधित कर रहे हो?”
चूडियों वाले ने उत्तर दिया, “भाई मेरा व्यवसाय ही ऐसा है, मुझे दिन भर महिलाओं से ही वाणी-व्यवहार करना पडता है। यदि मैं इस जबान को जरा भी अपशब्द के अनुकूल बनाउं तो मेरा धंधा ही चौपट हो जाय। मैं तो मात्र अपनी वाणी की परिशुद्धता के लिये, इस गधी को भी माँ-बहन कह, सम्बोधित करता हूं। इससे नारी उद्बोधन में मेरे वचन सजग रहते हुए पावन और सौम्य बने रहते है। और मेरा मन भी पवित्रता से हर्षित रहता है।

Thursday, 14 July 2016

आदमी वो नहीं जो

Aadmi Woh Nahi Jo Chehre Se Dikhta Hai,
Aadmi Woh Hai Jo Soach Se Dikhta Hai.

आदमी वो नहीं जो चेहरे से दिखता है,
आदमी वो है जो सोच से दिखता है.

एक बार मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन अपने एक सहायक के साथ ऑफिस में काम कर रहे थे। काम खत्म हो जाने के बाद बहुत सारे कागज मेज पर इकट्ठे हो गए। उन सभी को बराबर करके बांधने के लिए आइंस्टीन पेपर क्लिप टूंढने लगे। उन्हें एक जगह व्यवस्थित करके
रखना जरूरी था, नहीं तो वे इधर-उधर हो जाते। लेकिन उस समय आइंस्टीन व उनके सहायक को कहीं भी पेपर क्लिप नजर नहीं आ
रही थी। आखिर आइंस्टीन को एक खराब सी मुड़ी हुई क्लिप मिली, मगर उसे सीधा करना जरूरी था, तभी वह काम आती। आइंस्टीन उस क्लिप को सीधा करने में जुट गए। काफी देर हो गई। इसी बीच उनका सहायक बाजार जाकर पेपर क्लिप का नया पैकेट खरीद लाया। उसने नई पेपर क्लिप लाकर कागजों में लगा दी और फिर अपने काम में जुट गया। एक-दो घंटे में अपना काम खत्म करने के बाद सहायक आइंस्टीन के पास आया तो यह देखकर दंग रह गया कि वह अभी भी उस खराब व मुड़ी हुई क्लिप को सीधा करने में लगे थे। सहायक ने कहा, ‘सर, मुझे पेपरों को क्लिप में लगाए लगभग दो घंटे होने वाले हैं और आप अभी भी इसे सीधा करने में लगे हैं। अब इसकी कोई जरूरत नहीं है।
अब तो बहुत सारी नई क्लिप आ गई हैं।’ सहायक की बात सुनकर आइंस्टीन बोले, ‘तुम अपनी जगह ठीक हो। लेकिन मैं एक बार जब अपना कोई लक्ष्य तय कर लेता हूं तो उससे हटना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। मैं उसे पूरी करके ही रहता हूं।’ यह सुनकर सहायक दंग रह गया। उसे आइंस्टीन की सफलता का राज समझ में आ गया।